नई दिल्ली: भारत की प्राचीन साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान मिली है। देश के तीन ऐतिहासिक ग्रंथों महाभारत, राजतरंगिणी और कौटिल्य के अर्थशास्त्र को यूनेस्को के ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड’ एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय रजिस्टर में शामिल किया गया है। इंडोनेशिया के जकार्ता में आयोजित इस रजिस्टर की 11वीं बैठक में यह फैसला लिया गया। इस उपलब्धि के साथ ही इस सूची में भारत के प्राचीन ग्रंथों की संख्या बढ़कर छह हो गई है।
यूनेस्को की सूची में अब भारत के 6 प्राचीन ग्रंथ
भारत के इन तीनों ग्रंथों को यूनेस्को के ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड’ कार्यक्रम के एशिया और प्रशांत क्षेत्रीय रजिस्टर में जगह मिली है। इससे पहले मई 2024 में मंगोलिया की राजधानी उलानबटोर में हुई 10वीं बैठक के दौरान भारत के तीन अन्य ग्रंथों पंचतंत्र, सहृदयालोक-लोचन और रामचरितमानस को इस सूची में शामिल किया गया था।
इस तरह अब भारत के कुल छह प्राचीन ग्रंथ इस क्षेत्रीय रजिस्टर का हिस्सा बन चुके हैं। इन तीनों नई प्रविष्टियों के नामांकन से जुड़े दस्तावेज तैयार करने में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) की अहम भूमिका रही।
महाभारत: युद्ध की कहानी के साथ जीवन का दर्शन
महाभारत को दुनिया के सबसे बड़े महाकाव्य के रूप में जाना जाता है। कुरुक्षेत्र के युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित यह ग्रंथ केवल कौरवों और पांडवों के संघर्ष की कहानी नहीं बताता, बल्कि जीवन, कर्तव्य, नैतिकता और मानवीय मूल्यों से जुड़े गहरे संदेश भी देता है।
इसमें दर्ज प्रसंग और संवाद आज भी लोगों को अपने जीवन के फैसलों और जिम्मेदारियों को समझने की प्रेरणा देते हैं। यही वजह है कि सदियों पुराना होने के बावजूद महाभारत की प्रासंगिकता आधुनिक समय में भी बनी हुई है।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र: शासन और राजनीति की अनमोल सीख
कौटिल्य का अर्थशास्त्र भारतीय राजनीति, प्रशासन और आर्थिक नीतियों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्राचीन ग्रंथ है। कौटिल्य को चाणक्य और विष्णुगुप्त के नाम से भी जाना जाता है। माना जाता है कि उन्होंने लगभग चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास इस ग्रंथ की रचना की थी।
इसमें राज्य संचालन, प्रशासनिक व्यवस्था, राजनीति और अर्थव्यवस्था से जुड़े सिद्धांतों का विस्तार से वर्णन मिलता है। इसकी खासियत यह है कि इसमें बताई गई शासन व्यवस्था और नीतियों से जुड़े कई विचार आज भी अध्ययन और चर्चा का विषय बने हुए हैं।
राजतरंगिणी: कश्मीर के राजाओं का इतिहास समेटे है यह ग्रंथ
राजतरंगिणी संस्कृत भाषा में लिखा गया ऐतिहासिक ग्रंथ है। इसकी रचना 12वीं शताब्दी के आसपास कश्मीर के इतिहासकार कल्हण ने की थी। राजतरंगिणी का अर्थ ‘राजाओं की नदी’ या राजाओं का प्रवाह होता है।
इस ग्रंथ में कश्मीर के विभिन्न शासकों, उनके शासनकाल और उस समय की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं का क्रमबद्ध विवरण मिलता है। इतिहास के अध्ययन में इसका विशेष महत्व है, क्योंकि इसमें राजाओं और उनके दौर की घटनाओं को व्यवस्थित तरीके से दर्ज किया गया है। इसी वजह से राजतरंगिणी को भारत के शुरुआती प्रामाणिक ऐतिहासिक ग्रंथों में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
